श्री बांके बिहारी लाल की आरती।
जय हो वृन्दावन बिहारी की॥
तिरछी चितवन मुरली अधर धरे।
भक्तन के दुःख हारी की॥
जय हो वृन्दावन बिहारी की॥
पीताम्बर तन शोभित सुन्दर।
कुण्डल श्रवण संवारी की॥
राधा वल्लभ प्रीतम प्यारे।
सेवा करूं तुम्हारी की॥
जय हो वृन्दावन बिहारी की॥
निधिवन में रास रचाये।
गोपी संग खिलारी की॥
शरण पड़ा हूं दास तुम्हारा।
लाज रखो अब मेरी की॥
जय हो वृन्दावन बिहारी की।
जय हो वृन्दावन बिहारी की॥
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यह आरती श्री बांके बिहारी जी (भगवान श्रीकृष्ण के त्रिभंगी रूप, वृन्दावन के प्रसिद्ध मंदिर के आराध्य) की स्तुति में गाई जाती है। इसमें उनकी तिरछी चितवन, मुरलीधारी रूप और वृन्दावन-निधिवन की लीलाओं का वर्णन है।
This aarti praises Shri Banke Bihari Ji, the beloved tribhanga form of Lord Krishna worshipped at the famous Vrindavan temple, describing His enchanting glance, flute-bearing form and pastimes in Nidhivan.